जैन धर्म का इतिहास , त्रिरत्न , पंच महाव्रत

जैन धर्म का इतिहास , त्रिरत्न , पंच महाव्रत :: जैन धर्म प्रमुख धर्मो में से एक माना जाता हैं। आज hindivaani जैन धर्म के बारे में जानकारी प्रदान करेगा। जिसके अंतर्गत आपको महावीर स्वामी का जीवन परिचय , जैन धर्म के त्रिरत्न, जैन धर्म के पंच महाव्रत , जैन धर्म के सिद्धांत , जैन धर्म कर त्योहार आदि की जानकारी प्रदान की जॉयेगी। तो आइए शुरू करते है।

जैन धर्म का इतिहास , त्रिरत्न , पंच महाव्रत ::

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जैन धर्म का इतिहास , त्रिरत्न , पंच महाव्रत ::

जैन धर्म क्या है ?

जैन भारत का सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है।जैन धर्म के आदि पुरुष ऋषभदेव जी थे थे। जैन साहित्य के अनुसार जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी इस धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व में वैशाली के निकट कुंड नामक ग्राम में हुआ था।इनकी माता का नाम त्रिशला और पिता का नाम सिद्धार्थ था। युवावस्था में महावीर स्वामी का विवाह राजकुमारी यशोदा से हो गया था।अपने पिता की मृत्यु के पश्चात महावीर स्वामी ने सन्यास धारण कर लिया। और 12 वर्ष तक कठोर तपस्या की।12 वर्ष की अवधि के पश्चात उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई ।ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात महावीर स्वामी ने जैन धर्म के प्रचार का कार्य प्रारंभ किया । धर्म प्रसार के लिए आजीवन प्रयास करते हुए ही 527 ईसा पूर्व पूर्व में पटना के निकट पावापुरी नामक स्थान पर महावीर स्वामी ने देह त्याग दिया। धार्मिक क्रांति के युग में महावीर स्वामी ने जैन धर्म का प्रचार प्रसार किया।

जैन धर्म के सम्प्रदाय –

जैन धर्म के सम्प्रदाय को दो भागों में बांटा गया हैं।

  1. श्वेताम्बर
  2. दिगम्बर
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श्वेतांबर संप्रदाय जैन धर्म का एक प्रमुख संप्रदाय है इस संप्रदाय के साधुओं श्वेत रंग के वस्त्र धारण करते हैं। और जैन धर्म की कठोरता और जटिलता को कम करने के पक्ष पाती होते हैं। दिगंबर संप्रदाय जैन धर्म का एक अन्य प्रमुख संप्रदाय है इस शाखा के साधु नग्न अवस्था में रहते हैं और दिशाओं को भी अपना वस्त्र मानते हैं ।यह कठोर तपस्वी होते हैं।एवं महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित जैन धर्म के प्राचीन और कठोर और नियमों का पालन करते हैं।

जैन धर्म कर ग्रन्थ –

जैन धर्म के कुछ महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं जो निम्नलिखित हैं।

  1. जैन आगम सूत्र
  2. परिशिष्ट पर्वन

जैन धर्म के सिद्धांत

जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित है।

ईश्वर में अविश्वास

जैन धर्म अनुयाई ईश्वर की सृष्टि का निर्माता एवं पालन करता नहीं मानते है। यह धर्म संसार को किसी सृजन कार्य की रचना नहीं मानते हैं ।महावीर स्वामी के अनुसार ईश्वर नाम की ऐसी कोई सत्ता नहीं है। जो जीव जंतुओं के सुख या दुख की निर्धारण करती हो ।स्वयं के कर्मों के अनुरूप ही लोगों को सुख दुख मिलता है।

वेदों में अविश्वास –

जैन धर्म के अनुयाई वेदों में विश्वास नहीं करते हैं।वेदों में ईश्वर और सृष्टि के बारे में जो कुछ कहा गया है।उस पर इनका विश्वास नहीं है। वह केवल महावीर स्वामी के सिद्धांतों पर विश्वास करते हैं।

जैन धर्म के त्रिरत्न –

जैन धर्म के मुख्य त्रिरत्न ने निम्नलिखित हैं।

  1. सम्यक ज्ञान
  2. सम्यक दर्शन
  3. सम्यक चरित्र
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जैन धर्म कर पंच महाव्रत –

जैन धर्म के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए पांच आने नियमों का पालन करना ही अति आवश्यक है। इन्हें पांच अणु व्रत कहा जाता है।
यह निम्नलिखित हैं।

  1. अहिंसा – इसका अर्थ जीवों के प्रति दया का व्यवहार
  2. सत्य – सत्य बोलना सत्य बोलने के लिए मनुष्य को लोभ मोह माया एवं क्रोध से दूर रहना चाहिए।
  3. अस्तेय – इसका आशय चोरी न करना तथा चोरी की योजनाएं बनाना।
  4. अपरिग्रह – इसका अर्थ है सांसारिक वस्तुओं का संग्रह करने के लिए मोह छोड़ देना।
  5. ब्रम्हचर्य – इसका अर्थ है इंद्रियों को वश में करते हुए सच्चरित्र जीवन व्यतीत करना

कर्म की प्रधानता –

जैन धर्म का अनुवाद में विश्वास करता है इस सिद्धांत के अनुसार जो इस संसार में जन्म लेता है उसे अपने इस जन्म और पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार फल की प्राप्ति होती है कर्म के आधार पर ही जीव कोयो नियम सुख-दुख की प्राप्ति होती है जैन दर्शन में कर्मबंधन तीन बलों – मन बल , वचन बल और काय बल द्वारा स्वीकार किया जाता है। अर्थात मन में विचार कर लेने से ही शुभ एवं अशुभ कर्मों का बंधन हो जाता है।

पुनर्जन्म से मुक्ति-

जैन धर्म के अनुयायियों का मत है कि मनुष्य पूर्व जन्म के कर्मों को भोगने के लिए ही बार बार जन्म लेता है। जब उसकी आत्मा यह जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है।

आत्मा की सत्ता में विश्वास

महावीर स्वामी चेतन प्राणियों में आत्मा का अस्तित्व मानते थे।इसी आधार पर यह माना जाता है कि प्रत्येक जीव में एक की स्थाई अजर अमर आत्मा निवास करती है।और जीव की मृत्यु हो जाने पर उसकी आत्मा नया शरीर धारण कर लेते हैं।

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अनेकान्तवाद-

भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से पदार्थों को जानकर विभिन्न धर्मों अपने एकाकी ज्ञान को ही पूर्ण सत्य ज्ञान मानकर दूसरे मत के सिद्धांत को असत्य सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। तथा परस्पर संघर्ष से पूर्ण वाद विवाद करते हैं।जैन धर्म में मत के पारस्परिक वाद विवाद को दूर करने के लिए अनेकांतवाद का प्रतिपादन किया अर्थात कोई भी सिद्धांत अथवा कथन पूर्णरूपेण सत्य या असत्य नहीं है।

स्यादवाद

स्यादवाद जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका अर्थ यह हैं कि जो बात कही जा रही है वह किसी विशेष अपेक्षा से कहीं जा रही है। किंतु यह बात अन्य दृष्टिकोण से या अन्य अपेक्षाओं से भी कही जा सकती है। और नहीं भी कही जा सकती अर्थात प्रत्येक दृष्टिकोण में सत्य और असत्य पर व्यक्ति की अपेक्षाओं के अनुसार छिपा रहता है।

जैन धर्म के त्योहार –

जैन धर्म कर त्योहार हैं वो अग्रलिखित हैं।

  1. पंचकल्याणक
  2. पर्युषण
  3. महावीर जयंती
  4. ऋषि पंचमी
  5. ज्ञान पंचमी
  6. जैन धर्म मे दीपावली
  7. दशलक्षणधर्म

आशा हैं कि हमारे द्वारा दी गयी जैन धर्म का इतिहास , त्रिरत्न , पंच महाव्रत आपको पसन्द आयी होगी। यदि आपको जैन धर्म का इतिहास , त्रिरत्न , पंच महाव्रत की जानकारी पसन्द आयी हो तो इसे अपने दोस्तों से जरूर शेयर करे।

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